टी.एन. शेषन : वो चुनाव आयुक्त, जिसके सामने प्रधानमंत्री भी झुक गए

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नई हलचल विशेष डॉ सोहन भार्गव प्रधान संपादक नई हलचल

नई दिल्ली नई हलचल /भारत के लोकतंत्र की कहानी में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें कुर्सी ने बड़ा नहीं बनाया, बल्कि उन्होंने कुर्सी को बड़ा बना दिया। टी.एन. शेषन उन्हीं में से एक थे। एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही नेताओं की धड़कनें बढ़ जाती थीं, फर्जी वोटों से चुनाव जीतने वालों की नींद उड़ जाती थी और आम वोटर को पहली बार ये एहसास हुआ था कि उसका एक वोट ही इस देश की सबसे बड़ी ताकत है।

तिरुनेल्लई नारायण अय्यर शेषन का जन्म 15 दिसंबर 1932 को तमिलनाडु के पलक्कड़ में हुआ था। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1955 बैच के अधिकारी थे। लंबे समय तक वे केंद्र सरकार में कई बड़े पदों पर रहे, कैबिनेट सचिव तक बने, लेकिन देश ने उन्हें तब पहचाना, जब वे 12 दिसंबर 1990 को देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनका कार्यकाल 11 दिसंबर 1996 तक रहा। महज 6 साल का ये कार्यकाल भारतीय चुनाव व्यवस्था का स्वर्ण युग कहलाता है।

शेषन से पहले चुनाव आयोग को लोग एक रबर स्टैंप समझते थे। नेता चुनावों में खुलेआम पैसा बांटते थे, शराब बंटती थी, बूथ कैप्चरिंग आम बात थी, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग होता था, मंत्री चुनाव के दौरान तबादले और घोषणाएं करते थे और फर्जी वोटिंग से जीत का आंकड़ा तय हो जाता था। शेषन ने आते ही इस पूरे सिस्टम को हिला दिया।

उन्होंने सबसे पहला और सबसे बड़ा काम किया, मतदाता पहचान पत्र लागू करना। उन्होंने साफ कहा कि बिना फोटो पहचान पत्र के कोई वोट नहीं डाल सकेगा। उस समय देश के करोड़ों वोटरों का पहचान पत्र बनाना असंभव सा लगता था, लेकिन शेषन अड़ गए। उनका मानना था कि जब तक फर्जी वोटर को रोका नहीं जाएगा, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा। आज जो वोटर आईडी कार्ड हर घर में है, वो शेषन की ही देन है।

दूसरा बड़ा बदलाव था आदर्श आचार संहिता को सख्ती से लागू करना। शेषन से पहले आचार संहिता कागज पर थी, शेषन ने उसे हथियार बना दिया। चुनाव की घोषणा होते ही उन्होंने सरकारी गाड़ियों, सरकारी विज्ञापनों, मंत्रियों के उद्घाटन और शिलान्यास, तबादलों पर रोक लगा दी। सरकारी बंगले, हेलीकॉप्टर, सरकारी खर्च पर चुनाव प्रचार सब बंद। उन्होंने आदेश दिया कि चुनाव के दौरान कोई भी नेता सरकारी सुविधा का इस्तेमाल नहीं करेगा।

तीसरा कठोर फैसला था चुनाव खर्च पर लगाम। उन्होंने नेताओं के खर्च का हिसाब मांगना शुरू किया, चुनावी रैलियों, पोस्टरों, लाउडस्पीकर और वाहनों की वीडियोग्राफी करवाई। जो नेता खर्च का हिसाब नहीं दे पाता था, उसका नामांकन रद्द होने का डर पैदा हो गया। बड़े-बड़े नेताओं के पर्चे खारिज हुए, कई नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका गया।

शेषन ने बूथ कैप्चरिंग के खिलाफ भी ऐसी कार्रवाई की, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। जहां बूथ लूट की खबर आती थी, वहां वो तुरंत चुनाव रद्द कर दोबारा मतदान कराते थे। उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सैकड़ों बूथों पर पुनर्मतदान करवाया। बाहुबलियों को साफ संदेश था कि अब दबंगई से चुनाव नहीं जीता जाएगा।

उन्होंने चुनावों में धर्म, जाति और सांप्रदायिक नारों पर भी सख्त पाबंदी लगाई। उन्होंने कहा कि जो नेता वोट के लिए धर्म का इस्तेमाल करेगा, वो चुनाव नहीं लड़ सकेगा। उन्होंने मतदान केंद्रों पर सुरक्षा बलों की तैनाती, मतदाता सूची का शुद्धिकरण, मृत और फर्जी नामों को हटाना, सभी पर काम किया।

शेषन की सख्ती से सबसे ज्यादा परेशानी बड़े नेताओं को हुई। कहा जाता है कि उस समय के प्रधानमंत्री भी उनसे नाराज रहते थे, लेकिन शेषन ने कभी समझौता नहीं किया। एक बार उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि चुनाव आयोग सरकार का गुलाम नहीं है, वो संविधान का रक्षक है। उन्होंने कई बार चुनाव की तारीखें टाल दीं, क्योंकि उन्हें लगता था कि कानून व्यवस्था ठीक नहीं है। कई राज्यों के चुनाव उन्होंने सुरक्षा कारणों से आगे बढ़ाए, चाहे सरकार कितना भी दबाव बनाए।

उनके फैसलों की वजह से ही 1991, 1993 और 1996 के चुनाव भारतीय लोकतंत्र के सबसे साफ-सुथरे चुनाव माने गए। पहली बार आम वोटर को लगा कि उसका वोट सुरक्षित है, उसकी आवाज सुनी जा रही है। लोग बेखौफ होकर वोट डालने लगे।

शेषन को लोग ‘अलसेसियन’ कहते थे, क्योंकि वो काटते नहीं थे, लेकिन डराते बहुत थे। उनकी छवि एक ईमानदार, निर्भीक और जिद्दी अधिकारी की थी। वे खुद कहते थे कि मैं अपने फैसलों के लिए किसी से डरता नहीं, क्योंकि मेरे पीछे संविधान खड़ा है।

1996 में जब उनका कार्यकाल खत्म हुआ, तो देश ने उन्हें विदाई दी, लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है। आज चुनाव आयोग जो भी सख्ती करता है, उसकी नींव शेषन ने ही रखी थी। वोटर आईडी, आचार संहिता, खर्च की सीमा, बूथों पर सुरक्षा, ये सब उनकी देन है।

1997 में उन्होंने राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा, लेकिन हार गए। 10 नवंबर 2019 को 86 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन आज भी हर चुनाव में लोग कहते हैं कि काश एक शेषन और होता।

टी.एन. शेषन ने साबित कर दिया कि अगर एक आदमी ईमानदारी से खड़ा हो जाए, तो पूरा सिस्टम बदल सकता है। उन्होंने वोटर को उसकी असली ताकत का एहसास कराया और नेताओं को ये समझाया कि जीत फर्जी वोटों से नहीं, जनता के भरोसे से मिलती है। इसलिए आज भी देश उन्हें सिर्फ एक चुनाव आयुक्त के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के रक्षक के रूप में याद करता है और सम्मान करता है

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