श्योपुर / नई हलचल देश की सबसे महत्वाकांक्षी वन्यजीव परियोजना प्रोजेक्ट चीता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। कूनो नेशनल पार्क में एक चीते को गोली मारे जाने की खबर ने पूरे वन विभाग और प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस चीते को अफ्रीका से लाकर भारत की धरती पर फिर से बसाने का सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देखा था, उसी सपने को कूनो के अधिकारी अपनी लापरवाही और कमजोर सुरक्षा व्यवस्था के चलते चकनाचूर करते नजर आ रहे हैं।बताया जा रहा है कि चीता पार्क के कोर एरिया से बाहर निकलकर आसपास के ग्रामीण क्षेत्र में पहुंच गया था। इसी दौरान उस पर गोली चलाई गई। गोली लगने से चीता गंभीर रूप से घायल हुआ। घटना के बाद पार्क प्रबंधन में हड़कंप मच गया। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और घायल चीते का उपचार शुरू कराया गया, लेकिन तब तक घटना ने यह साबित कर दिया कि कूनो में चीतों की सुरक्षा के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।सूत्रों के अनुसार कूनो में चीतों की ट्रैकिंग के लिए लगाए गए रेडियो कॉलर, जीपीएस सिस्टम और पेट्रोलिंग टीम के बावजूद चीता बिना किसी रोक-टोक के आबादी वाले इलाके तक पहुंच गया। सवाल यह है कि जब एक-एक चीते की हर गतिविधि पर नजर रखने का दावा किया जाता है, तो गोली चलने से पहले उसे रोका क्यों नहीं गया? ग्रामीणों और शिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखने में वन विभाग क्यों नाकाम साबित हो रहा है? पार्क के बफर जोन में अवैध हथियारों की मौजूदगी और शिकार की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन उन पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई। प्रोजेक्ट चीता को प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जाता है। 17 सितंबर 2022 को जब नामीबिया से आठ चीते कूनो लाए गए थे, तो पूरे देश ने इसे भारत के वन्यजीव इतिहास में नया अध्याय माना था। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से भी चीते लाए गए। करोड़ों रुपये इस परियोजना पर खर्च किए गए। विदेश से विशेषज्ञ बुलाए गए। लेकिन बार-बार चीतों की मौत, आपसी संघर्ष में चीतों का मारा जाना और अब गोलीबारी की घटना ने इस पूरे प्रयास पर पानी फेरने का काम किया है।
वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों का कहना है कि कूनो में चीतों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। पेट्रोलिंग सिर्फ दिखावे के लिए होती है। ग्रामीणों को जागरूक करने और उन्हें विश्वास में लेने का काम भी अधूरा है। कई बार ग्रामीण चीतों को अपनी मवेशियों के लिए खतरा समझते हैं, तो कई बार शिकारियों की नजर इन दुर्लभ चीतों पर होती है। ऐसे में अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे स्थानीय लोगों के साथ बेहतर तालमेल बनाएं, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इधर, घटना के बाद वन विभाग के अधिकारी मामले को दबाने और लीपापोती करने में जुटे हुए बताए जा रहे हैं। न तो स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है कि गोली किसने चलाई, न ही यह कि गोली चलाने के पीछे मंशा क्या थी। क्या यह शिकारी की हरकत थी या ग्रामीणों का भय था, यह जांच का विषय है। लेकिन इतना तय है कि यदि समय रहते सख्त सुरक्षा इंतजाम किए गए होते, तो यह नौबत नहीं आती। कूनो की घटना ने एक बार फिर यह मांग तेज कर दी है कि प्रोजेक्ट चीता की सुरक्षा व्यवस्था की उच्च स्तरीय समीक्षा हो। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो और पार्क के आसपास के गांवों में अवैध हथियारों के खिलाफ अभियान चलाया जाए। प्रधानमंत्री की मंशा थी कि भारत में चीते फिर से दौड़ें और कूनो दुनिया के नक्शे पर वन्यजीव पर्यटन का बड़ा केंद्र बने। लेकिन अधिकारियों की उदासीनता इस मंशा को धूमिल कर रही है।अब देखना होगा कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस घटना को कितनी गंभीरता से लेती है। क्या सिर्फ जांच के नाम पर खानापूर्ति होगी, या वाकई में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे? कूनो के चीते की चीख देश को यही पूछ रही है कि आखिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा








