विदिशा/लटेरी डॉ सोहन भार्गव। देशभर में जहां विजयादशमी पर रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, वहीं मध्यप्रदेश के विदिशा जिले की लटेरी तहसील में स्थित कालादेव ग्राम में दशहरा आज भी चमत्कार से कम नहीं है। यहां रावण को जलाया नहीं, पूजा जाता है और राम-रावण की सेना के बीच सजीव युद्ध होता है, वो भी पत्थरों से।
मान्यता है कि राम की कृपा से सनसनाते हुए पत्थर रामदल के किसी सैनिक को छू भी नहीं पाते।
क्या है 500 साल पुरानी अनोखी परम्परा?
भोपाल से करीब 150 किलोमीटर दूर गुना जिले की सीमा से लगे कालादेव गांव में रावण की 20 फीट ऊंची विशाल पाषाण प्रतिमा स्थित है।
दशहरे के दिन यहां दो दल बनते हैं –
राम दल – कालादेव के स्थानीय ग्रामीण
रावण दल – गांव से सटे जंगल में रहने वाले भील और बंजारा आदिवासी समाज के लोग, जो गोफन (गोतिया) चलाने में माहिर होते हैं।
मैदान में रावण की प्रतिमा से करीब 200 मीटर दूर राम का ध्वज गाड़ा जाता है। यही ध्वज राम और रावण के युद्ध का प्रतीक होता है।
नियम है कि राम दल को उस ध्वज की परिक्रमा कर उसे छूना होता है। जैसे ही करीब 200 स्थानीय लोग ध्वज की ओर बढ़ते हैं, रावण दल की ओर से गोफन से पत्थरों की बौछार शुरू हो जाती है।
सनसनाते पत्थर और राम की कृपा का चमत्कार
यहां के लोगों का कहना है – उड़ती हुई चिड़िया को मार गिराने वाले निशानेबाज भी कालादेव में असहाय नजर आते हैं।
बंदूक की गोली से भी तेज रफ्तार से आने वाले पत्थर राम की सेना के पास पहुंचकर अपनी दिशा बदल देते हैं।
गांव वाले इसे सीधे राम का प्रताप मानते हैं। मान्यता है कि पत्थरों की इस बौछार में रामदल का कोई भी व्यक्ति घायल नहीं होता, बल्कि पत्थर दिशा बदलकर बाहर निकल जाते हैं।
एक और मान्यता बेहद सख्त है – इस रामदल में सिर्फ कालादेव के स्थानीय लोग ही शामिल हो सकते हैं। अगर कोई बाहरी व्यक्ति रामदल में शामिल होता है तो उसे चोट लगने की संभावना रहती है।
टोंक नवाब ने भी परखा था सच
बुजुर्गों के अनुसार इस परम्परा की शुरुआत कई सौ साल पहले हुई थी। इसकी सच्चाई परखने के लिए टोंक रियासत के नवाब ने अपने सैनिकों को रावण दल में शामिल कर राम दल पर बंदूक से गोलियां तक चलवाईं। चमत्कारिक रूप से कोई भी गोली राम दल को नहीं लगी। इसके बाद नवाब ने इस परम्परा की सत्यता को स्वीकार किया।
भील आदिवासियों को राम का आशीर्वाद
इस परम्परा में रावण दल की भूमिका आदिवासी, भील और बंजारा समाज निभाते हैं, जो गोफन से निशाना लगाने में माहिर होते हैं।
पहले रावण की प्रतिमा के पास आदिवासी समाज के लोग पत्थरों का ढेर लगाकर अपनी गोफन तैयार कर लेते हैं। आयोजन की शुरुआत गांव के मुखिया द्वारा गणेश पूजन और निशान (झंडा) चढ़ाने से होती है, फिर भगवान राम-जानकी का दल दशहरा मैदान पहुंचता है। रामलीला के बाद युद्ध शुरू होता है। राम दल के विजयी होने पर पूरे गांव में जश्न मनाया जाता है।
स्व. लक्ष्मीकांत शर्मा ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान
लटेरी-सिरोंज क्षेत्र के विकास पुरुष रहे पूर्व संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्री स्वर्गीय लक्ष्मीकांत शर्मा ने इस लुप्त हो रही आदिवासी परम्परा को मंच दिया। वे लगातार नौ साल प्रदेश के संस्कृति मंत्री रहे और उन्होंने कला-संस्कृति के क्षेत्र में अलग पहचान बनाई।
उन्होंने ही कालादेव के इस अनोखे दशहरे को शासन की संस्कृति विभाग की सूची में शामिल करवा कर इसे जिला और प्रदेश स्तर के दशहरा उत्सवों में पहचान दिलाई। आज इसी कारण यहां 10 हजार से ज्यादा लोग, राजस्थान सहित कई जिलों से इस चमत्कार को देखने आते हैं।
नई हलचल न्यूज के लिए दशहरा विशेष में इतना ही – यह सिर्फ पत्थरबाजी नहीं, आस्था है कि जब तक राम की कृपा है, बुराई कितनी भी तेज वार करे, अच्छाई का बाल भी बांका नहीं होगा









