त्योहारों में दिखावा बनाम भावना: हम क्या खो रहे हैं

Share करें

✓ Link copy हो गया!

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

डॉ सोहन भार्गव प्रधान संपादक नई हलचल ग्रुप    बाजार सज चुके हैं। सड़कों पर रोशनियों की झालरें हैं, दुकानों पर भीड़ है और मोबाइल फोन पर सेल और ऑफर्स के संदेशों की बाढ़ है। देखकर लगता है कि त्योहार आ गया है। पर क्या सचमुच त्योहार आ गया है? यह सवाल बाजार को देखकर नहीं, मन को टटोल कर पूछना होगा। क्योंकि बाहर जितनी रोशनी बढ़ी है, भीतर उतना ही कुछ धुंधला हुआ सा लगता है।
कभी दिवाली की तैयारी महीना भर पहले शुरू होती थी। घर की लिपाई-पुताई पूरे परिवार का उत्सव होता था। आंगन में चूल्हे पर चकली और गुजिया बनती थीं, जिसकी महक पूरे मोहल्ले में जाती थी। कुम्हार के चाक से उतरे कच्चे दीयों को घर लाकर सुखाना भी एक अनुष्ठान था। शाम होते ही बच्चे एक-दूसरे के घर जलते दिए गिनने निकल पड़ते थे। वह त्योहार सामान का नहीं, साथ का था।

आज तस्वीर बदल गई है। लिपाई की जगह वॉलपेपर ने ले ली है, हाथ की बनी मिठाई की जगह ब्रांडेड डब्बों ने ले ली है और कुम्हार के दीयों की जगह चीनी झालरों ने ले ली है। अब हम त्योहार मनाते कम हैं, दिखाते ज्यादा हैं। बालकनी सजते ही सबसे पहले कैमरा खुलता है। गिफ्ट आने से पहले उसकी फोटो स्टेटस पर लगती है। हमने खुशी को जीने की बजाय दिखाने की वस्तु बना दिया है। राखी पर बहन के घर जाने से ज्यादा जरूरी उसी दिन कूरियर से गिफ्ट भिजवाना हो गया है। होली पर गले मिलने से ज्यादा जरूरी हैप्पी होली का फॉरवर्ड मैसेज भेजना हो गया है।
इसी दिखावे में हम बहुत कुछ गंवा रहे हैं। सबसे पहले हम रिश्तों की गर्माहट खो रहे हैं। त्योहार तो बहाना थे मिलने का, बैठने का, मन की बात कहने का। आज एक ही घर में पिता-पुत्र दो अलग-अलग कमरों में बैठकर दुनिया भर को बधाई संदेश भेज रहे हैं, पर आपस में दो बात नहीं कर पा रहे। पड़ोसी के घर थाली में मिठाई ले जाना अब पुराने जमाने की बात लगती है। गेट पर सिक्योरिटी है और हमारे पास समय का अभाव। दूसरा, हम उन हाथों को खो रहे हैं जिन्होंने हमारे त्योहारों को जिंदा रखा। कुम्हार, बुनकर, माली, छोटा हलवाई, ये सब हमारे उत्सव की रीढ़ थे। फैक्ट्री की मिठाई और विदेशी लाइटों ने उनके घरों की रोशनी छीन ली है। हम बाजार से सब कुछ खरीद ला रहे हैं, पर किसी हुनरमंद के घर त्योहार नहीं पहुंचा पा रहे।
और सबसे बड़ी बात, हम खुद को ही खो रहे हैं। हर दीया कभी अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक था। हर त्योहार हमें ठहरना, सोचना और आभार जताना सिखाता था। आज हजार वाट की रोशनी में भी मन में एक अजीब सी खालीपन है। कर्ज लेकर महंगे कपड़े और महंगे उपहार खरीदकर हम आखिर किसे दिखाना चाहते हैं और क्यों? आधुनिक होना गलत नहीं है। ऑनलाइन खरीददारी सुविधा है और तस्वीरें लेना भी बुरी बात नहीं। लेकिन जब सुविधा ही साध्य बन जाए और दिखावा ही परंपरा की जगह ले ले, तब त्योहार की आत्मा चली जाती है, केवल उसका ढांचा बचता है।
मध्यप्रदेश के इंदौर ने सफाई में पूरे देश को रास्ता दिखाया है। इस बार क्यों न हम अपने त्योहारों की भी सफाई करें। दिखावे की धूल को हटाकर देखें। इस दीपावली पर यदि एक दीया भी कुम्हार से खरीदा, एक डिब्बा मिठाई पड़ोसी को खुद हाथ में जाकर दिया और एक घंटा बिना मोबाइल के सिर्फ अपने परिवार के साथ बैठकर बात की, तो समझिए त्योहार मन गया। वह सुकून जो उस एक घंटे में मिलेगा, वह हजार लाइक्स और कमेंट्स में भी नहीं मिलेगा। क्योंकि त्योहार बाजार में नहीं लगते, वे मन में बसते हैं और रोशनी बालकनी में नहीं, रिश्तों में होनी चाहिए। आइए अपने त्यौहारों की वो रौनक वापस लाये अपनो के साथ त्यौहार मनाएं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें