भोपाल नई हलचल डॉ सोहन भार्गव मध्यप्रदेश नर्मदा और विंध्य की गोद में बसा शक्ति का प्रदेश है। शारदीय नवरात्रि में प्रदेश के 5 सबसे जागृत धामों में लाखों दीप एक साथ जगमगाते हैं। उज्जैन की हरसिद्धि, देवास की चामुंडा-तुलजा, आगर-मालवा की बगलामुखी, सलकनपुर की विजयासन मैहर की शारदा ,-और माँ जालपा मंदिर इन 5 मंदिरों की कथा ही मध्यप्रदेश के इतिहास की कथा है।
1. उज्जैन – माँ हरसिद्धि शक्तिपीठ : जहाँ गिरी थी सती की कोहनी
स्थान: रुद्रसागर तट, महाकालेश्वर मंदिर के समीप, उज्जैन
शक्तिपीठ क्रम: 51 शक्तिपीठों में 13वाँ
इतिहास और पौराणिक कथा:
शिव पुराण के अनुसार दक्ष यज्ञ के बाद भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर भ्रमण कर रहे थे, तब इस स्थान पर माता की कोहनी गिरी थी। स्कंद पुराण में कथा है कि चंड-मुंड के वध के लिए शिव ने चंडी का आह्वान किया और प्रसन्न होकर उन्हें ‘हरसिद्धि’ यानी सबको जीतने वाली की उपाधि दी।
मान्यता है कि द्वापर में श्रीकृष्ण ने जरासंध वध से पहले यहाँ पूजा की थी और उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य हरसिद्धि को अपनी कुलदेवी मानते थे। कहते हैं उन्होंने 12 बार अपना शीश अर्पित कर सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। मंदिर का मूल निर्माण विक्रमादित्य ने करवाया, जो लगभग 2000 वर्ष पुराना माना जाता है, और बाद में मराठा काल में इसका पुनर्निर्माण हुआ।
विशेषता: गर्भगृह में मूर्ति नहीं, श्री यंत्र है जिस पर सिंदूर चढ़ाया जाता है। प्रांगण में दो विशाल दीप स्तंभ हैं जो मराठा कला के प्रतीक हैं और नवरात्रि में 1000+ दीपों से जगमगाते हैं। यहाँ महालक्ष्मी, महासरस्वती के बीच अन्नपूर्णा विराजित हैं।
नवरात्रि में: यहाँ हरसिद्धि को दिन में गुजरात के हर्षद और रात में अवंतिका की अधिष्ठात्री माना जाता है, इसलिए नौ दिन अखंड ज्योत और महाआरती होती है।
2. देवास – माँ चामुंडा और तुलजा भवानी टेकरी : रक्तपीठ
स्थान: 300 फीट ऊँची टेकरी, देवास शहर
इतिहास और पौराणिक कथा:
यह 52 शक्तिपीठों से अलग है। यहाँ माता के अंग नहीं, बल्कि रक्त की दो बूँदें गिरी थीं, इसलिए इसे रक्तपीठ कहा जाता है। रक्त की बूँदों से दो देवियों का प्राकट्य हुआ – बड़ी बहन तुलजा भवानी और छोटी बहन चामुंडा देवी।
टेकरी का इतिहास करीब ढाई हजार साल पुराना माना जाता है। इसे देवास रियासत की कुलदेवी कहा जाता है और मराठा पंवार राजवंश ने तुलजा भवानी मंदिर की स्थापना करवाई थी। यहाँ नाथ सम्प्रदाय के सिद्ध गोरखनाथ, राजा भर्तृहरि और शीलनाथ महाराज ने तपस्या की है।
विशेषता: यह एक ही पहाड़ी पर दो बहनों का एकमात्र धाम है। मान्यता है कि माता दिन में तीन स्वरूप बदलती हैं – प्रातः बालिका, दोपहर युवती और संध्या प्रौढ़ा। इसलिए यहाँ दिनभर में तीन श्रृंगार होते हैं।नवरात्रि में: टेकरी पर 9 दिन मेला लगता है, 1400 सीढ़ियाँ पैदल चढ़कर भक्त दर्शन करते हैं।
3. आगर-मालवा – नलखेड़ा बगलामुखी : तंत्र की अधिष्ठात्री
स्थान: लखुंदर नदी तट, नलखेड़ा, आगर-मालवा जिला (प्रशासनिक रूप से राजगढ़ संभाग से जुड़ा आस्था केंद्र)
इतिहास और पौराणिक कथा:
यह दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या माँ बगलामुखी का विश्व प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। इसकी स्थापना महाभारत काल में भगवान कृष्ण के निर्देश पर धर्मराज युधिष्ठिर ने कौरवों पर विजय के लिए की थी। मंदिर में माता की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है और ईस्वी 1816 में इसका जीर्णोद्धार हुआ था।चारों ओर श्मशान के बीच स्थित यह मंदिर तंत्र साधना का केंद्र है। यहाँ त्रिशक्ति रूप में बगलामुखी के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कृष्ण, हनुमान और भैरव भी विराजित हैं।
विशेषता: विश्व में बगलामुखी के तीन ही प्रमुख मंदिर हैं, उनमें नलखेड़ा प्रमुख है। यहाँ पीले वस्त्र, पीली हल्दी और पीले पुष्प से पूजन होता है, शत्रु बाधा, कोर्ट-कचहरी से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध ‘मिर्ची हवन’ यहीं होता है।
नवरात्रि में: यहाँ तांत्रिक अनुष्ठान और पीताम्बरा हवन के लिए देशभर से राजनेता, अधिकारी और साधक आते हैं।
4. सीहोर – सलकनपुर विजयासन (बिजासन) धाम : विजय का आसन
स्थान: 1000 फीट ऊँचे विंध्य पर्वत पर, सलकनपुर, सीहोर (भोपाल से 70 किमी) इतिहास और पौराणिक कथा:
पुराणों के अनुसार देवी पार्वती ने रक्तबीज राक्षस का वध करने के बाद इसी स्थान पर विजय मुद्रा में तपस्या की, इसलिए वे विजयासन कहलाईं। मंदिर की मूर्ति स्वयंभू है जिसे किसी ने तराशा नहीं है, बाद में चाँदी के नेत्र और मुकुट से सजाया गया।
स्थानीय इतिहास दो धाराओं में है – महंतों के अनुसार मंदिर 400 साल पुराना है और गर्भगृह में 400 साल से दो अखंड ज्योतियाँ जल रही हैं, वहीं कुछ इतिहासकार इसे 1100 ईस्वी में गोंड राजाओं द्वारा गिन्नौरगढ़ किले के निर्माण के समय का बताते हैं। एक मान्यता यह भी है कि 300 साल पहले बंजारों ने पशु व्यापार के दौरान खोए पशुओं के मिलने पर इस मंदिर का निर्माण करवाया था। भोपाल नवाब के संरक्षण काल में यहाँ अखंड धूनी स्थापित हुई।
विशेषता: 1400 सीढ़ियाँ, 1000 फीट की चढ़ाई और अब रोपवे। यह 52वाँ शक्तिपीठ भी कहा जाता है। संत भद्रानंद ने यहाँ नल योगिनियों की स्थापना कर इसे सिद्धपीठ बनाया था।
नवरात्रि में: शारदीय नवरात्र में यहाँ 15 लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं। भोपाल-इंदौर हाईवे से पैदल यात्रियों का सैलाब उमड़ता है।
5. सतना – मैहर शारदा धाम : माई का हार
स्थान: त्रिकूट पर्वत, 600 फीट ऊँचाई, मैहर, सतना जिला
इतिहास और पौराणिक कथा:
108 शक्तिपीठों में शामिल इस धाम में माता सती का हार (गले का हार) गिरा था, इसलिए नाम पड़ा माई+हार = मैहर। यह माता शारदा यानी सरस्वती का एकमात्र प्रमुख मंदिर है।मंदिर की खोज का श्रेय बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल को दिया जाता है। कहा जाता है आल्हा ने 12 वर्षों तक यहाँ तपस्या की और आज भी ब्रह्म मुहूर्त में सबसे पहले आल्हा ही पूजा करने आते हैं। ब्रिटिश इतिहासकार कनिंघम ने यहाँ 9वीं-10वीं सदी के शिलालेख खोजे थे जो अभी तक पूरी तरह पढ़े नहीं जा सके हैं।
विशेषता: 1063-1080 सीढ़ियाँ, रोपवे की सुविधा, और रात में मंदिर बंद होने के बाद भी अंदर से घंटी-पूजा की आवाज़ें आने की रहस्यमयी मान्यता। शाम की आरती के बाद पुजारी कपाट बंद कर देते हैं और सुबह श्रृंगार बदला हुआ मिलता है। नवरात्रि में: ज्ञान, संगीत और विद्या की देवी के रूप में छात्रों, कलाकारों की विशेष भीड़ होती है। नवरात्रि स्पेशल निष्कर्ष ये 5 धाम महाकाल की नगरी से विंध्याचल तक एक ही शक्ति परिक्रमा बनाते हैं। हरसिद्धि में तंत्र का यंत्र, देवास में रक्त की शक्ति, नलखेड़ा में शत्रु स्तंभन, सलकनपुर में विजय का वरदान और मैहर में विद्या का आशीर्वाद –









