किताबों से दूरी बना रहे हैं युवा, मात्र मोबाइल बना उनका हर सहारा

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(डॉ सोहन भार्गव प्रधान संपादक नई हलचल) एक समय था जब हर युवा के हाथ में किताबें होना उसकी पहचान माना जाता था। बस स्टैंड , ट्रेन के सफर में या घर की छत पर कोई न कोई उपन्यास, कविता संग्रह या पत्रिका पढ़ता हुआ मिल ही जाता था। आज तस्वीर बदल गई है। हाथ में अब भी कुछ है, पर वह किताब नहीं, मोबाइल का चमकता स्क्रीन है। यह बदलाव केवल उन की आदत का नहीं, बल्कि उन की बदलती सोच का संकेत है। साहित्य से युवा पीढ़ी की बढती दूरी को इसी रूप में देखना चाहिए।
आज के भागम भाग व्यस्त जीवन में युवा के पास समय की कमी है, पर विकल्पों की भरमार है। तीस सेकंड की रील में मिलने वाला मनोरंजन जब तुरंत उपलब्ध है, तो तीन सौ पन्नों के उपन्यास के लिए धैर्य कौन रखे। साहित्य को समझने के लिए समय,एकांत, धैर्य उच्च कोटि की सोच चाहिए, जो साहित्य के गूढ रहस्य को परिभाषित कर सके । आज की वर्तमान स्थिति में बिना श्रम किए ही मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सारी जानकारी स्क्रीन पर हमारे सामने आ जाती है। जिससे हम अपना कार्य बड़ी आसानी से पूर्ण कर लेते हैं। ऐसे में हमारी बुद्धि प्रखर होने के बजाय कुंद होती चली जाती है, क्योंकि बिना मेहनत के मनचाही जानकारी हमारे सामने होती है। जो जानकारी किताबों के अध्ययन, खोज आदि के माध्यम से प्राप्त होती है। वह चिरकाल तक अमर रहती है । बिना मेहनत के चंद मिनट में मिली हुई जानकारी गूगल मैप के द्वारा बताए गए रास्ते के समान होती है, जो कभी-कभी भटकाव भी कर देती है और व्यक्ति उस भटकाव के पचड़े में पड़कर अपना सब कुछ गंवा देता है।आज प्रेमचंद, निराला या मुक्तिबोध की भाषा कई युवाओं को कठिन और उबाऊ लगने लगती है। उन्हें लगता है, कि साहित्य उनके जीवन से कटा हुआ अनुपयोगी व अतीत की बात है।
परंतु यह धारणा आधी सच्ची है। दोष केवल युवा का नहीं है, हमने साहित्य को उनके करीब लाने का प्रयास ही कितना किया है? हमारे पाठ्यक्रमों ने साहित्य को परीक्षा में अंक लाने का साधन बना दिया, उसे जीने का अनुभव नहीं बनने दिया। घरों में भी यह माहौल धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। जहाँ पिता अखबार की संपादकीय पढ़कर सुनाते थे या दादी किस्सागोई में कहानियों को जीवंत कर देती थीं। पर आज अपने बच्चों के लिए किसी के पास कभी भी समय नहीं है घर में भी हम चार लोग एकत्रित होते हैं तो कुछ समय बाद ही अपने-अपने मोबाइल में खो जाते हैं बच्चे जैसा देखते हैं वैसा ही हुए अपनी जीवन शैली में अपना लेते हैं। जब साहित्य ही बोझ बन जाएगा, तो उससे दूरी स्वाभाविक है। सोशल मीडिया ने इस खालीपन को भरा तो है, पर उसने गहराई के स्थान पर सतह को स्थापित कर दिया है।
साहित्य से यह दूरी अंततः एक बड़ी सांस्कृतिक क्षति है। साहित्य केवल भाषा का शृंगार नहीं है, वह मनुष्य को मनुष्य बनाता है। वह हमें दूसरे के दुख को समझना सिखाता है, शब्दों को तौलकर बोलना सिखाता है और जीवन की जटिलताओं को धीरज से देखना सिखाता है। जो पीढ़ी केवल ट्रेंड पर प्रतिक्रिया करती है, वह धीरे-धीरे स्वयं सोचना छोड़ देती है। साहित्य वही सोच वापस लौटाता है। इसलिए यह चिंता केवल लेखकों या प्रकाशकों की नहीं, पूरे समाज की है।
इस स्थिति को पलटा जा सकता है, पर उपदेश से नहीं, बल्कि साहित्य को नए रूप में प्रस्तुत करके। जरूरी है कि साहित्य को मंचों से उतारकर युवाओं की भाषा , उनके माध्यमों में ले जाया जाए। ऑडियो बुक, पॉडकास्ट, छोटे वीडियो में कविता पाठ और सोशल मीडिया पर कहानी कहने के नए प्रयोग इस दिशा में सेतु बन सकते हैं। विद्यालयों में किताबों पर चर्चा हो, लेखकों से सीधा संवाद हो और घर में रोज कुछ पन्ने पढ़ने की आदत फिर से डाली जाए। युवा साहित्य से दूर नहीं है, वह बस उससे जुड़ने का नया रास्ता खोज रहा है। यदि हम वह रास्ता बना सके तो स्क्रीन की चमक में भी किताब की महक लौट सकती है

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