भोपाल/इंदौ र नई हलचल न्यूज नेटवर्क। मध्यप्रदेश में पंचायत राज व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। गांवों के विकास के लिए आने वाले करोड़ों रुपये के बजट के बीच यदि सरपंचों और पंचायत सचिवों की संपत्ति की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो भ्रष्टाचार की कई परतें खुल सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार मिल रही शिकायतों ने इस मांग को और तेज कर दिया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायतों में स्वीकृत सड़क, नाली, पेयजल, प्रधानमंत्री आवास और मनरेगा जैसे कार्यों में कागजों पर विकास दिखाकर राशि का बंदरबांट किया जा रहा है। कई पंचायतों में पांच साल के कार्यकाल में ही सरपंच और सचिव की जीवनशैली में आया बदलाव चर्चा का विषय बना हुआ है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा यदि आय से अधिक संपत्ति को लेकर विशेष अभियान चलाया जाए, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। मांग उठ रही है कि –
सभी सरपंच-सचिवों के लिए संपत्ति का वार्षिक विवरण सार्वजनिक करना अनिवार्य हो।
पंचायत कार्यों का थर्ड पार्टी ऑडिट कराया जाए।
शिकायतों पर सीधी कार्रवाई के लिए हेल्पलाइन मजबूत की जाए।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पारदर्शिता के लिए ई-पंचायत और जियो-टैगिंग व्यवस्था लागू की गई है। वहीं विपक्ष ने सरकार पर नकेल कसने में ढिलाई का आरोप लगाया है।यह एक बड़ा सवाल है, और इसके पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि कई व्यवस्थागत और राजनीतिक कारण हैं:
1. शिकायत व्यवस्था की कमजोरी
अधिकतर ग्रामीण डर या जानकारी के अभाव में लिखित शिकायत नहीं करते। मौखिक आरोपों पर लोकायुक्त या EOW सीधी जांच शुरू नहीं कर सकता। बिना ठोस दस्तावेज के जांच अटक जाती है।
2. राजनीतिक संरक्षण का आरोप
विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि सरपंच निचले स्तर की राजनीतिक कड़ी होते हैं। जिला पंचायत से लेकर विधायक-सांसद तक का नेटवर्क होने से उन पर कार्रवाई राजनीतिक रूप से नुकसानदायक मानी जाती है।
3. जांच एजेंसियों पर बोझ
प्रदेश में हजारों ग्राम पंचायतें हैं। लोकायुक्त और EOW के पास सीमित स्टाफ है। वे बड़ी रिश्वतखोरी या हाई-प्रोफाइल मामलों को प्राथमिकता देते हैं, पंचायत स्तर के मामलों की फाइलें अक्सर लंबित रह जाती हैं।4. ऑडिट में खामियां
सरकार का पक्ष है कि अब ई-पंचायत, जियो-टैगिंग और ऑनलाइन भुगतान से पारदर्शिता आई है। अधिकारियों के अनुसार हर काम का सोशल ऑडिट होता है, लेकिन जमीनी हकीकत में ऑडिट अक्सर कागजों तक सीमित रह जाता है।5. कानूनी प्रक्रिया की जटिलता
आय से अधिक संपत्ति साबित करना आसान नहीं होता। संपत्ति अक्सर परिवार के सदस्यों के नाम पर होती है, जिससे जांच वर्षों तक चलती है और परिणाम नहीं निकलता, जिससे अधिकारियों का मनोबल भी टूटता है।इसीलिए मांग उठ रही है कि जांच शिकायत के आधार पर नहीं, बल्कि रैंडम संपत्ति ऑडिट और संपत्ति विवरण को सार्वजनिक करने की व्यवस्था से हो, ताकि किसी को बचने का मौका न मिले। क्या कहना है इनका मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़े बहुत गहरी है नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार हो रहा बिना पैसे के काम होना मुश्किल नहीं हैं कांग्रेस के शासन काल में डर होता था कि हम पकड़ा जाएंगे पर आज चोर चोर मौसेरे भाई हो रहे तो पकड़ेगा कौन ईमानदारी से कारवाही हो तो कई चेहरे बेनकाब हो सकते जयवर्धन सिंह पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश शासन शासकीय तंत्र में पंचायत राज में भारी भ्रष्टाचार है भारी भ्रष्टाचार के चलते जनता का काफी नुकसान हो रहा है और इसका सबसे बड़ा कारण भाजपा की सरकार ओर बैठे नेता है जिनके संरक्षण में यह सब हो रहा है अगर राजगढ़ की बात करें तो सभी हद पार हो चुकी है प्रियव्रत सिंह खींची पूर्व ऊर्जा मंत्री मध्य प्रदेश शासन









