बिरसामुंडा मेडिकल कॉलेज का मामलामेडिकल कॉलेज में तड़पती रही प्रसूता, निजी अस्पताल में पहुंचते ही हुआ ऑपरेशन!

Share करें

✓ Link copy हो गया!

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

परिजनों का आरोप—सुबह से दर्द में कराहती रही महिला, डॉक्टर-नर्स ने नहीं दिया ध्यान; रात 9 बजे निजी अस्पताल ले गए तो एक घंटे में बची जच्चा-बच्चे की जान, इलाज के नाम पर बड़ी रकम खर्च होने का भी दावा

शहडोल नई हलचल    शहडोल मेडिकल कॉलेज की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 21 सितंबर को सामने आए एक मामले में प्रसूता के परिजनों ने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। परिवार का कहना है कि महिला को सुबह प्रसव के लिए मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, लेकिन वह दिनभर प्रसव पीड़ा से तड़पती रही और बार-बार मदद की गुहार लगाने के बावजूद उसकी हालत पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

परिजनों का आरोप है कि महिला की हालत को गंभीरता से लेने के बजाय बुखार का हवाला देकर मामले को टाल दिया गया। परिवार के लोग दिनभर अस्पताल में परेशान होते रहे और महिला दर्द से कराहती रही।

रात 9 बजे लिया बड़ा फैसला

परिजनों के मुताबिक जब देर रात तक स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो परिवार ने आखिरकार रात करीब 9 बजे महिला को निजी अस्पताल ले जाने का फैसला किया।

परिवार का दावा है कि निजी अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने महिला की जांच की और करीब एक घंटे के भीतर ऑपरेशन कर दिया। ऑपरेशन के बाद मां और बच्चा दोनों सुरक्षित बताए गए।

“थोड़ी और देर होती तो स्थिति बिगड़ सकती थी”

परिजनों के अनुसार निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि महिला की स्थिति गंभीर थी और ज्यादा देरी होने पर गर्भाशय फटने तथा बच्चे की जान को खतरा हो सकता था।

हालांकि, इन चिकित्सकीय दावों की पुष्टि महिला के मेडिकल रिकॉर्ड और स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच से होना बाकी है।

“सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिला, निजी में बड़ी रकम देकर कराना पड़ा इलाज”

इस पूरे मामले में परिजनों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि उन्हें मजबूरी में निजी अस्पताल का रुख करना पड़ा और वहां इलाज के लिए बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी।

परिवार का कहना है कि अगर मेडिकल कॉलेज में समय पर महिला की गंभीरता से जांच और आवश्यक उपचार किया जाता तो उन्हें रात में निजी अस्पताल जाने और अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने की नौबत नहीं आती।

यही आरोप अब मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है—क्या सरकारी अस्पताल में समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है?

कई सवालों के घेरे में अस्पताल की व्यवस्था

परिजनों के आरोपों के बाद कई सवाल सामने हैं—

– सुबह भर्ती हुई प्रसूता की लगातार निगरानी क्यों नहीं हुई?
– प्रसव पीड़ा में तड़प रही महिला को समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक ने देखा या नहीं?
– यदि ऑपरेशन की आवश्यकता थी तो निर्णय में देरी क्यों हुई?
– निजी अस्पताल में पहुंचने के बाद इतनी जल्दी ऑपरेशन की जरूरत क्यों पड़ी?
– क्या मेडिकल कॉलेज में प्रसूता के उपचार से संबंधित सभी मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध हैं?
– और सबसे अहम—क्या सरकारी अस्पताल की कथित देरी का आर्थिक बोझ आखिरकार परिवार को निजी अस्पताल में बड़ी रकम खर्च करके उठाना पड़ा?

अब मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के जवाब का इंतजार

मामला गंभीर है। इसलिए अस्पताल प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि महिला को किस समय भर्ती किया गया, उसकी जांच कब-कब हुई, डॉक्टरों ने क्या उपचार दिया और निजी अस्पताल रेफर करने अथवा ऑपरेशन का निर्णय क्यों नहीं लिया गया।

परिजनों के आरोप सही हैं या उपचार में देरी के पीछे कोई चिकित्सकीय कारण था—इसका फैसला मेडिकल रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए।

लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि अगर सरकारी मेडिकल कॉलेज में मरीज समय पर उपचार के लिए पहुंचता है, तो उसे समय पर इलाज और सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें