घटते जंगल, बढ़ता प्रदूषण और खत्म होती ताजी हवा पर अगर आज हम गंभीरता से नहीं सोचेंगे तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। कभी सुबह की खिड़की खोलते ही जो हवा भीतर आती थी, उसमें मिट्टी की सोंधी गंध होती थी, पत्तों की सरसराहट होती थी। आज वही खिड़की खोलिए तो नाक में धुआं भर जाता है और गले में खराश होने लगती है। यह किसी एक शहर की कहानी नहीं है, यह लगभग हर हिस्से की नियति बनती जा रही है।हम हर साल वृक्षारोपण के रिकॉर्ड तोड़ते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, पौधे लगाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि जंगल जो दशकों में बनते हैं, वे घंटों में कट जाते हैं। सड़क हो, मकान हो, फैक्ट्री हो या खदान, हर विकास परियोजना की पहली बलि पेड़ ही होता है। हमने जंगल को लकड़ी समझा, जमीन समझा, लेकिन कभी जीवन समझा ही नहीं। नतीजा आज सामने है। मानसून अनियमित हो गया है, गर्मी असहनीय होती जा रही है और हवा जहरीली बन चुकी है।
कभी प्रदूषण को हम महानगरों की बीमारी मानते थे, लेकिन आज छोटे शहरों और कस्बों तक में हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर पहुंच रही है। वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, फैक्ट्रियों का कचरा, हर तरफ से हम अपनी ही सांसों पर हमला कर रहे हैं। बच्चे अस्थमा के इनहेलर लेकर स्कूल जा रहे हैं और बुजुर्गों के फेफड़े जवाब दे रहे हैं। विडंबना यह है कि हम मास्क को ही इसका समाधान मान बैठे हैं।
सोचकर देखिए, वह हवा जिसके लिए कभी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती थी, आज वह सबसे महंगी चीज बन गई है। घरों में एयर प्यूरीफायर जरूरत बन गए हैं और लोग ताजी हवा के लिए पहाड़ों पर हजारों रुपये खर्च करके जाते हैं। हमने ऑक्सीजन तक को बाजार की वस्तु बना दिया है।
सरकारें योजनाएं बनाती हैं और अदालतें आदेश देती हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव तभी होगा जब हम पेड़ को सिर्फ हरियाली नहीं बल्कि अपनी सांस मानेंगे। हर कटता पेड़ हमारी उम्र से कुछ साल छीन लेता है। यह बात समझने के लिए किसी वैज्ञानिक रिपोर्ट की जरूरत नहीं है, बस एक गहरी सांस लेने की जरूरत है। विकास जरूरी है, लेकिन कैसा विकास जो हमें सांस लेने लायक हवा भी न दे सके। जंगल बचाना अब कुछ पर्यावरण प्रेमियों का शौक नहीं रहा, यह हर नागरिक की जिम्मेदारी बन चुका है। क्योंकि जब आखिरी पेड़ कटेगा और आखिरी सांस जहरीली होगी, तब पैसा भी हमें बचा नहीं पाएगा।









