(गंजबासौदा नई हलचल) किसी शहर का गौरव केवल उसकी इमारतों, बाजारों या इतिहास से नहीं बनता, उसकी पहचान तब वैश्विक होती है जब वहां की प्रतिभा और विचार दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचते हैं। क्षेत्र के लिए ऐसा ही गौरवपूर्ण क्षण तब आया, जब नगर के वेदांत आश्रम के संस्थापक जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी डॉ. रामकमलाचार्य वेदांतीजी महाराज ने अमेरिका की विश्वविख्यात हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ऐतिहासिक सैंडर्स थिएटर मेमोरियल हॉल में भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा और रामचरितमानस की वैश्विक प्रासंगिकता पर संबोधन दिया। हार्वर्ड के इस मंच पर जगद्गुरु डॉ. वेदांतीजी ने गोस्वामी तुलसीदास की चर्चा के साथ जगद्गुरु रामानंदाचार्य की परंपरा का भी उल्लेख किया और तुलसीदास जी की पंक्ति “रामानंद को चेला, राम को सनेही…” के माध्यम से भारतीय भक्ति परंपरा की उस विराट धारा को सामने रखा, जिसने सदियों से समाज को जोड़ने का कार्य किया है।
मालूम हो कि जीवाजीपुर स्थित वेदांत आश्रम के संस्थापक और नगर में अपना बाल्यकाल का प्रारंभिक सन्यासी जीवन व्यतीत करने वाले और जगद्गुरु डॉ. रामकमलाचार्य वेदांतीजी महाराज करीब 6 माह से विदेशों के अलग-अलग शहरों में जाकर वे इस यात्रा के माध्यम से भारतीय सनातन संस्कृति, धर्म-दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। विभिन्न देशों में रामचरितमानस, श्रीमद् भागवत महापुराण, महाभारत, शिवमहापुराण सहित भारतीय धार्मिक ग्रंथों की कथाओं और उनके जीवनोपयोगी संदेशों के माध्यम से वे सनातन धर्म की मूल भावना को विश्व समाज तक पहुंचा रहे हैं। इसी कड़ी में दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में जहां ज्ञान को शोध, तर्क और प्रयोग की कसौटी पर परखा जाता है, उसी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मंच पर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी बनकर जगदगुरु रामानंदाचार्य स्वामी डॉ. रामकमलाचार्य वेदान्ती जी महाराज ने बोस्टन के सैंडर्स थिएटर मेमोरियल हॉल में आयोजित धर्म सभा में गोस्वामी तुलसीदास और रामचरितमानस को केवल धार्मिक आस्था के विषय के रूप में नहीं, बल्कि मानव जीवन, विश्वशांति और विश्वबंधुत्व के सार्वभौमिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। स्वामी वेदान्तीजी महाराज ने कहा कि आधुनिक विश्व आज शांति की तलाश में है। विज्ञान ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया, लेकिन मनुष्य के भीतर की अशांति का समाधान अभी भी उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता है। ऐसे समय में लगभग पांच सौ वर्ष पहले गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचा गया रामचरितमानस आज भी विश्वबंधुत्व, करुणा, मर्यादा, प्रेम और समरसता का संदेश देता है।
तुलसीदास को समाज ने ठुकराया, उन्होंने ने संसार को मानस दिया
वेदांतीजी महाराज ने तुलसीदास जी के जीवन के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि जिस बालक को जीवन के आरंभ में ही उपेक्षा मिली, जिसे अमंगल का सूचक मानकर छोड़ दिया गया, वही आगे चलकर ऐसा महाकाव्य रच गया जिसने भाषा, भूगोल और समय की सीमाओं को पार कर लिया। उन्होंने कहा कि तुलसीदास जी की महानता केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने रामचरितमानस लिखा, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने राम को राजमहलों से निकालकर जन मानस का राम बना दिया। मानस के एक-एक शब्द में भक्ति है, लेकिन उसके भीतर जीवन का दर्शन भी है। उसमें धर्म है, लेकिन धर्म के साथ मानवीय संवेदना है। उसमें राम हैं, लेकिन राम के साथ सम्पूर्ण मानवता के लिए मर्यादा का संदेश भी है।
हार्वर्ड ज्ञान की उपासना करता है, मानस का विज्ञान यहां मिलने आया है
कार्यक्रम में विश्वविख्यात रामकथा वाचक मोरारी बापू जी की रामकथा भी चल रही है। कथा के प्रारंभ में स्वामी वेदान्तीजी महाराज ने साकेतवासी पंडित रामकिंकर जी महाराज के विचारों का स्मरण करते हुए कहा गीता में जो योग है, रामचरितमानस में उसका प्रयोग है। उन्होंने कहा कि हार्वर्ड ज्ञान की उपासना का केंद्र है और आज यहां ज्ञान को मानस का विज्ञान मिलने आया है। मानस केवल थ्योरी नहीं, प्रैक्टिकल है। स्वामी वेदान्तीजी महाराज ने तुलसीदास जी द्वारा जगद्गुरु रामानंदाचार्य की परंपरा के उल्लेख को भी सामने रखा। उन्होंने कवितावली की पंक्ति रामानंद को चेला, राम को सनेही,ऋसो तो तुलसी कहत जग साची बानि है का उल्लेख करते हुए बताया कि तुलसीदास की रामभक्ति के पीछे संत परंपरा की वह विराट धारा रही, जिसने भक्ति को किसी वर्ग की सीमा में नहीं रखा, बल्कि उसे जन-जन तक पहुंचाया