
डॉ सोहन भार्गव प्रधान संपादक/ स्वतंत्र भारत नेएक सपना देखा था – जाति विहीन समाज का। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को इस सपने तक पहुँचाने के लिए एक अस्थायी पुल माना था, वह भी दस वर्ष तक के लिए। दुर्भाग्य से, आज वह अस्थायी पुल स्थायी मंजिल बन गया है ।आज उसी पुल पर खड़े होकर हम जाति को खत्म करने के बजाय उसे और मजबूत कर रहे हैं।आज हालत यह है , कि एक बच्चा पैदा होते ही जान जाता है , कि वह सामान्य , ओ.बी.सी ., एस.सी या एस.टी. वर्ग से आता है। स्कूल में एडमिशन से लेकर कॉलेज, नौकरी, प्रमोशन और चुनाव तक हर जगह उसे अपनी जाति का प्रमाण पत्र दिखाना पड़ता है। हम उस से कहते हैं, कि जातिवाद मत करो, लेकिन हर सरकारी फॉर्म में हम ही उससे उसकी जाति पूछते हैं। यह कैसा विरोधाभास है इस व्यवस्था का सबसे घातक परिणाम सामाजिक ताने वाने पर पड़ा है। योग्यता धीरे-धीरे गौण होती जा रही है और जाति प्राथमिक पहचान बन गई है। जब एक 90 प्रतिशत लाने वाला छात्र देखता है कि 60 प्रतिशत वाला साथी सिर्फ जाति प्रमाण पत्र के कारण आगे निकल गया, तो उसके मन में व्यवस्था के साथ साथ उस की जाति के प्रति भी कड़वाहट पैदा होती है, जो कभी थी ही नहीं। वहीं दूसरी ओर, लाभ पाने वाला वर्ग भी खुद को हमेशा पीड़ित और पिछड़ा बनाए रखने में ही सुरक्षा समझता है। दोनों ही स्थितियों में जाति मजबूत होती है, कमजोर नहीं।राजनीति ने तो इस आग में घी डालने का काम किया है। आरक्षण अब सामाजिक न्याय का साधन कम, वोट बैंक का हथियार ज्यादा बन गया है। हर चुनाव से पहले कोई न कोई नई जाति आरक्षण की कतार में खड़ी कर दी जाती है – कभी जाट, कभी पटेल, कभी मराठा, कभी गुर्जर के नाम पर। यह सिद्ध करता है कि आरक्षण ने जातियों को खत्म नहीं किया, बल्कि नई-नई जातियों को भी आरक्षण के लिए अपनी जातिगत पहचान और आक्रामक रूप से उभारने पर मजबूर किया है।देश इसका खामियाजा भुगत रहा है। हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ लोग भारतीय से पहले अपनी जाति को प्राथमिकता दे रहे हैं। संस्थानों में आपसी अविश्वास बढ़ रहा है। प्रतिभा पलायन कर रही है । सबसे गरीब व्यक्ति – चाहे वह किसी भी जाति का हो – वह आज भी वहीं खड़ा है जहाँ 75 साल पहले खड़ा था। लाभ उसी जाति के संपन्न तबके तक सीमित होकर रह गया है। आरक्षण से किसी को नफरत नहीं, सवाल उसकी निरंतरता और उसके स्वरूप पर है। अगर लक्ष्य सच में जातिविहीन समाज है, तो हमें आरक्षण को जाति से ऊपर उठकर आर्थिक और वास्तविक शैक्षिक पिछड़ेपन से जोड़ना होगा। क्रीमी लेयर को पूरी ईमानदारी से लागू करना होगा ,साथ ही सबसे जरूरी बात यह है कि आरक्षण के लिए एक समय-सीमा तय करनी होगी । आज सोचने वाली बात यह है कि हम कब तक कब ह इस बैसाखी को हटाकर सबको बराबर दौड़ने का अवसर देंगे।
अन्यथा हम भविष्य में भी आरक्षण के नाम पर जाति को और जाति के नाम पर आरक्षण को जिंदा रखेंगे। भविष्य में भी यदि यही रहा, तो इस व्यवस्था के दुष्चक्र में फँसकर “एक भारत” का सपना कभी पूरा नहीं होगा। एक भारत के लिए हमें अपने निजी स्वार्थ से हटकर सामाजिक ताने वाले को मजबूत करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन करने होंगे।