कृष्ण की सखी हूं मैं,कृष्ण को ही ढूंढती हूं

Share करें

✓ Link copy हो गया!

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

कृष्ण की सखी हूं मैं,कृष्ण को ही ढूंढती हूं|
प्रेम रंग में रंगी हुई थी, अब प्रेम को ही छोड़ती हूं||
उलझनों की सुलझनों में, प्रेम की सभी धुनों में,
ढूंढती थी कृष्ण ही को, मानती थी कृष्ण ही को,
अड़चनों की एक व्यथा थी,प्रेम ही तो एक कथा थी,
हर समझ को छोड़ के मैं, उसको ही समझती थी,
प्रेम में रंगी कली थी,अनकही सी मनचली थी,
प्रेम ही संसार था, प्रेम ही व्यापार था,
लेन-देन प्रेम में ही, राग-द्वेष प्रेम में ही,
बंधनों को प्रेम समझी,
सावन था अश्रुओं का,उस सावन को प्रेम समझी…
धीरे-धीरे कृष्ण ही को, बंधनों में ले चली थी,
यस प्रमाण मानती थी, कहां सत्य जानती थी,
सारी धुंध हट गई फिर,एक क्यारी कट गई फिर,
वो कली मुरझा गई, और कृष्ण को समझने यहां चित्तविलास आ गई…

कि जब सुना था कृष्ण ही तो, त्रेता पार पात्र हैं,
जब सुना था कृष्ण ही तो,अद्वैत का चरितार्थ हैं,
दो नहीं है प्रेम भी तो, प्रेम भी ‘अद्वैत’ है,
‘स्वामीजी’ ने खुद कहा था, ब्रह्म ही तो पितृ है,
मैं करूं या तुम करो,कर्म ही तो योग है, ‘पंचयज्ञ’जो करूं तो,यही कर्म योग है..

कर्म ही तो भावना है, कर्म ही तो प्राण हैं,
कर सका जो कर्म तो, मनुष्य ही महान है,
चित्तशुद्धि है जरूरी, चित्त ही तो ‘ब्रह्म’ है,
सतचितों में सबसे ऊंचा, वहीं ‘परमानंद’ है…
काम,क्रोध, लोभ,मोह, ये अगर मैं छोड़ दूं,
मैं भी तुम हो, तुम भी मैं हूं, क्यों ना पथ मैं मोड़ दूं,
‘पार्थ’ सी नहीं धनुर्धर, कृष्ण की ‘सखी’ हूं मैं,
‘ब्रह्म’ को समझ रही हूं,इसपे लिख रही हूं मैं..
कर्म ही तो है तपोवन, कर्मयोग श्रेष्ठ है,
पार्थ बन जो सुन सका तो, तू भी तो ‘विशिष्ट’ है…
‘कर्मचक्र’ चल रहा है, क्या इसी में बल रहा है,
रति, तृप्ति,संतुष्टि, क्या इन्हीं में बल रहा है?
छोड़ यूं विषाद तू..
‘पार्थ’ सी अटल रही है,राह पे ही चल रही है,
‘कुंतीपुत्र’ है नहीं तू,किंतु ब्रह्म को समझ रही है…

है स्वतंत्र प्रेम ही तो, बंधनों को तोड़ दे,
प्रेम रंग में रंगी हुई थी,अब ‘अद्वैत’ वस्त्र ओढ़ ले..

है सुना जो ध्यान से तो, ध्यान मेरा धरना जी,
है ‘अधीरा’ नाम मेरा, लेखिका समझना जी…

~दीपाली सिंह ‘अधीरा’
(गंजबासौदा,जिला-विदिशा, म.प्र.

Leave a Comment

और पढ़ें

traffic tail