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गंजबासौदा )समुद्र की लहरें सामने हैं… अथाह, अनंत और लगातार उठती-गिरती हुईं लेकिन इन दिनों पुरी के समुद्र तट पर नगर के श्रद्धालु जिस गहराई में उतर रहे हैं, वहाँ पानी की नहीं, भक्ति की गहराई है। बाहर साक्षात समुद्र है और कथा स्थल के भीतर दो और समुद्र लहरा रहे हैं एक श्रीमद्भागवत और दूसरा भक्तमाल। फर्क सिर्फ इतना है कि बाहर के समुद्र में उतरने पर डूबने का डर है, जबकि कथा के इन सागरों में श्रद्धालु डूबना चाहते हैं। मान्यता है कि भगवान की कथा में जितना मन डूबेगा, भक्तों के चरित्र में जितना जीवन उतरेगा, उतना ही मनुष्य भवसागर से पार होने की राह पाएगा।
मालूम हो कि जगन्नाथपुरी में नगर की भारत तीर्थम संस्था के तत्वावधान में 10 दिवसीय धार्मिक यात्रा चल रही है। इसी यात्रा के तहत समुद्र तट के समीप श्रीमद्भागवत और भक्तमाल कथा का आयोजन हो रहा है। भक्तमाल कथा के यजमान नागेंद्र ममता उपाध्याय हैं। भक्तमाल कथा नौलखी खालसा के श्रीमहंत राम मनोहर दास जी महाराज के सान्निध्य में हो रही है जबकि श्रीमद्भागवत कथा का वाचन आचार्य पं. केशव प्रसाद शास्त्री जी कर रहे हैं।
भागवत में भगवान की कथा, भक्तमाल में भगवान तक पहुंचने वाले भक्त।
आचार्य पं. केशव प्रसाद जी शास्त्री कथा के दौरान मंच से भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वात्सल्य, प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा, ध्रुव की साधना या भगवान के प्रति पूर्ण समर्पहर प्रसंग जीवन के किसी न किसी प्रश्न का उत्तर देता दिखाई देता है। वहीं श्री महंत राम मनोहर दास जी महाराज के सान्निध्य में चल रही भक्तमाल कथा में माधवदास जी, गौरांग महाप्रभु, रघुनाथ दास जी, सालबेग जी और हरिदास जैसे भक्तों के चरित्र सामने आ रहे हैं। भागवत बताती है कि भगवान कौन हैं, भक्तमाल बताता है कि भगवान तक पहुंचने वाले भक्त कैसे बने। यही वजह है कि कथा स्थल पर बैठे श्रद्धालु कभी भगवान की लीला में डूबते हैं तो कभी भक्तों के जीवन में। कथा सुनते-सुनते कोई आंखें बंद कर लेता है, कोई हाथ जोड़ लेता है और कोई अपने भीतर उठते भावों को रोक नहीं पाता।
*समुद्र पूजन के बाद निकली कलश यात्रा और भक्ति के साथ हुई राष्ट्रभक्ति
कथा के शुभारंभ से पहले समुद्र का विधिवत पूजन किया गया। इसके बाद कलश यात्रा निकली। यात्रा में सबसे आगे महाप्रभु जगन्नाथ की झांकी रही। पीछे श्रद्धालु सिर पर कलश लेकर भजन-कीर्तन करते हुए चल रहे थे। कोई नाच रहा था, कोई जय जगन्नाथ के जयकारे लगा रहा था और कोई हाथ जोड़कर महाप्रभु का स्मरण कर रहा था। समुद्र की लहरों का स्वर और श्रद्धालुओं के संकीर्तन का नाद जब एक साथ मिला तो ऐसा लगा मानो जल का समुद्र भी भक्ति के समुद्र के साथ चल पड़ा हो। स्वतंत्रता दिवस पर कथा मंच का भाव और व्यापक हो गया। भगवान और भक्तों की कथाओं के बीच श्रीमहंतजी ने भारत के वीर सपूतों के शौर्य, संघर्ष और बलिदान की गाथा के भाव प्रवाह राष्ट्र प्रेम का स्मरण करा दिया । कथा सुन रहे श्रद्धालुओं के लिए यह क्षण भावुक करने वाला था। जहां भगवान की कथा ने आंखों में भक्ति के भाव भरे, वहीं वीरों की गाथा ने मन में देश के प्रति गर्व और कृतज्ञता का भाव जगाया।
भक्ति के मंच पर राष्ट्रभक्ति का यह संगम कथा के भाव को और गहरा कर गया।
सिद्ध बकुल में आज भी सुनाई देता है हरिनाम का भाव।
तीर्थयात्रा में श्रद्धालुओं को जगन्नाथपुरी के प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन भी कराए जा रहे हैं। इनमें सिद्ध बकुल विशेष आस्था का केंद्र है। यह स्थान पुरी के यवन हरिदास की साधना से जुड़ा है। भक्त परंपरा के अनुसार वे प्रतिदिन तीन लाख हरिनाम का जप करते थे।
महाप्रभु चैतन्य की दातून से जुड़े पावन प्रसंग के कारण सिद्ध बकुल का 540 साल प्राचीन बकुल वृक्ष श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। वृक्ष की छाया में बैठकर हरिनाम में डूबे हरिदास की साधना का स्मरण आज भी भक्तों को नाम-स्मरण की शक्ति का अनुभव कराता है।
गंभीरा मठ में आज भी होते हैं महाप्रभु की चरण पादुकाओं के दर्शन।
यात्रा में गम्भीरा मठ के दर्शन भी कराए जा रहे हैं। यह चैतन्य महाप्रभु की पुरी में साधना और कृष्ण-प्रेम से जुड़ा प्रमुख स्थल है। यहां महाप्रभु से जुड़ी चरण पादुकाएं, भिक्षा पात्र और जल पात्र श्रद्धा के साथ आज भी सुरक्षित हैं। 10 दिवसीय यात्रा में श्रद्धालुओं को महाप्रभु जगन्नाथ, साक्षी गोपाल, बेड़ी हनुमान और लिंगराज महादेव सहित आसपास के प्रमुख तीर्थों के दर्शन भी कराए जा रहे हैं।
लिंगराज महादेव को लेकर धार्मिक परंपरा में मान्यता है कि उनके दर्शन से 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है। श्रद्धालुओं के लिए ये दर्शन कथा के साथ आध्यात्मिक अनुभव को और व्यापक कर रहे हैं।
तीन समुद्रों के बीच भक्ति का सहस्रार्चन,महाप्रभु को लगा 56 भोग।
पुरी के समुद्र तट पर कथा में भक्ति का अलग ही रंग दिखाई दे रहा है। वही मनीष अरोड़ा की ओर से महाप्रभु को 56 भोग के साथ ही कमल पुष्पों से भगवान का सहस्रार्चन आचार्य केशव शास्त्री जी के आचार्यात्व में वैदिक ब्राह्मण अनिल भार्गव एवं गौरव शर्मा द्वारा कमल पुष्पों से संपन्न कराया गया। 56 भोग में अन्न का समर्पण हुआ, सहस्र कमलों में श्रद्धा खिली और कथा के बीच भक्तिभाव का ऐसा समुद्र बना, जिसके आगे पुरी का साक्षात समुद्र भी जैसे एक दृश्य भर रह गया।